बचपन के रंग में हम अपनी बातों, अपनी कोशिश और अपने विचारों को रख कर आप तक पहुँचाना चाहते है.
बुधवार, मार्च 20
मंगलवार, मार्च 12
शुक्रवार, मार्च 8
शनिवार, जनवरी 26
एक बच्ची स्कूल नहीं जाती, बकरी चराती है
एक बच्ची स्कूल नहीं जाती, बकरी चराती है
वह लकडियां बटोरकर घर लाती है
फिर मां के साथ भात पकाती है
एक बच्ची किताब का बोझ लादे स्कूल जाती है
शाम को थकी मांदी घर आती है
वह स्कूल से मिला होमवर्क मां-बाप से करवाती है
बोझ किताब का हो या लकडी का
बच्चियां ढोती हैं
लेकिन लकडी से चूल्हा जलेगा
तब पेट भरेगा
लकडी लाने वाली बच्ची यह जानती है
वह लकडी की उपयोगिता पहचानती है
किताब की बातें कब किस काम आती हैं
स्कूल जाने वाली बच्ची
बिना समझे रट जाती है
लकडी बटोरना
बकरी चराना
और मां के साथ भात पकाना
जो सचमुच घरेलू काम हैं
होमवर्क नहीं कहे जाते
लेकिन स्कूलों से मिले पाठों के अभ्यास
भले ही घरेलू काम न हों
होमवर्क कहलाते हैं
कब होगा
जब किताबें
सचमुच
होमवर्क से जुडेंगी
और लकडी बटोरने वाली बच्चियां भी
ऐसी किताबें पढेंगी
वह लकडियां बटोरकर घर लाती है
फिर मां के साथ भात पकाती है
एक बच्ची किताब का बोझ लादे स्कूल जाती है
शाम को थकी मांदी घर आती है
वह स्कूल से मिला होमवर्क मां-बाप से करवाती है
बोझ किताब का हो या लकडी का
बच्चियां ढोती हैं
लेकिन लकडी से चूल्हा जलेगा
तब पेट भरेगा
लकडी लाने वाली बच्ची यह जानती है
वह लकडी की उपयोगिता पहचानती है
किताब की बातें कब किस काम आती हैं
स्कूल जाने वाली बच्ची
बिना समझे रट जाती है
लकडी बटोरना
बकरी चराना
और मां के साथ भात पकाना
जो सचमुच घरेलू काम हैं
होमवर्क नहीं कहे जाते
लेकिन स्कूलों से मिले पाठों के अभ्यास
भले ही घरेलू काम न हों
होमवर्क कहलाते हैं
कब होगा
जब किताबें
सचमुच
होमवर्क से जुडेंगी
और लकडी बटोरने वाली बच्चियां भी
ऐसी किताबें पढेंगी
........श्याम बहादुर “नम्र”
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रविवार, नवंबर 25
मंगलवार, नवंबर 13
शनिवार, अक्टूबर 20
कविता - सर्दी आई
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मेरी कविता
गुरुवार, अक्टूबर 4
श्रवण कुमार का चित्र
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गुरुवार, सितंबर 20
मेरी कविता - बकरी
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बच्चों के गीत
रविवार, सितंबर 2
शुक्रवार, अगस्त 31
मंगलवार, अगस्त 28
देशप्रेम की एक कविता
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सोमवार, जुलाई 23
गुरुवार, जून 7
35 लाख रुपये खर्चा
योजना आयोग का दफ्तर में हगने और मूतने के लिए 35 लाख रुपये खर्चा हो जाते है, और आम जनता को रहने के लिए एक झोपड़ी नसीब नहीं हो रही है. योजना आयोग के पदाधिकारी इस खर्च को सही बता रहे है. एक तरफ ये गाँव में शौचालय 1000 रुपये में बना देते है और दूसरी तरफ 35 लाख रुपये ये तो गलत बात है. काम दोनों में एक ही होना है, पर काम करने वाले अलग है. अब हमें तय करना है की जिस देश में लोग भूख से मर रहे हो, जिस देश में किसान आत्महत्या कर रहा हो, जिस देश में लाखों युवा बेरोजगार है उस देश की विकास के लिए योजना बनाने वाले कहाँ मूतेंगे और कहाँ हगेंगे ? चिंता मत करो जिस दिन देश की जनता हिसाब मागेगी उस दिन इनको दोनों के लिए खेत भी नसीब नहीं होगा.
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बुधवार, जून 6
एक सवाल
पहली 5 सम संख्याओं का जोड़ कितना होगा ?
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बच्चों के लिए सवाल
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