बचपन के रंग में हम अपनी बातों, अपनी कोशिश और अपने विचारों को रख कर आप तक पहुँचाना चाहते है.
शनिवार, नवंबर 13
कविता : चिड़िया रानी - चिड़िया रानी
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कविता: जल का न करे दुरूपयोग
जल का न करे दुरूपयोग
जल ही जीवन है हम सबका,
कभी न करे दुरूपयोग इसका....
जल बिन जीवन होगा कैसा,
बंजर धरती बिन प्राणी जैसा....
आओ हम मिल सरंक्षण करे इसका,
जल ही जीवन है हम सबका....
आओ मिल पानी की बूंद बचाए हम,
जीवन के सबको सुखी बनाये हम....
जल के दुरूपयोग को मिल रोके हम,
दुनिया के जीवन आगे बढाये हम....
जल का है महत्त्व बड़ा,
इससे ही हर चीज खड़ा...
जल का हम सब करते उपयोग,
इसलिए कभी न करे इसका दुरूपयोग.....
लेखक: धर्मेन्द्र कुमार
कविता: खाई गधे की लात
खाई गधे की लात
एक लड़का जिसका नाम था सोहन,
वो दिन रात करता था आलसीपन...
कुछ दिन बाद आया जाड़ा,
खूब याद किया उसने पहाड़ा...
एक दिन घर में बैठा वो अन्दर,
अपनी जेब में रखे चुकंदर...
जमके उसने चुकंदर खाया,
दायें बाएं जो भी पाया....
चुकंदर में थे बड़े- बड़े कीड़े,
सोहन के पेट में पड़ गए कीड़े....
सोहन फ़िर तो चला बाज़ार,
गधे पर हुआ जमके सवार....
अक्ल से था वो निपट गंवार,
बिन के लगाम के हुआ सवार....
गधे ने फ़िर मारी लात ,
सोहन ने खाई चार गुलाट....
लेखक: मुकेश कुमार
गुरुवार, नवंबर 11
कविता: मोटा-मोटी
मोटा-मोटी
एक था मोटा, एक थी मोटी,खाते थे, दोनों दस-दस रोटी।
एक दिन उनके घर आए मेहमान,
बोले लगी है भूख कराओ खान-पान।
मोटी थी बड़ी आलसी और खोटी,
बोली घर में बनी नही है रोटी।
चट से बोली आटा रखा है घर में,
झट से पका लो रोटी चूल्हे में।
अभी नींद लगी है, इसलिए मुझे है सोना,
पक जाए अगर रोटी, तो मुझे जगा देना।
लेखक: आदित्य कुमार
बुधवार, नवंबर 10
कक्षा में है नही घड़ी
कक्षा में है नही घड़ी
कक्षा है भाई कितनी बड़ी,
पर लगी नही है कोई घड़ी...
मन करता है सब बच्चों का,
लाकर लगा दे एक घड़ी...
पर डर लगता है सब बच्चों को, टीचर, प्रिंसपल के डंडे से...
बच्चे भी कुछ कह नही पाते,
अपने क्लास के टीचर से... कक्षा है भाई कितनी बड़ी,
पर लगी नही है कोई घड़ी...
लेखक: ज्ञान कुमार
मंगलवार, नवंबर 9
कहानी: दो दोस्त और जंगल का राक्षस
दो दोस्त और जंगल का राक्षस
बहुत समय पहले की बात है की एक छोटा सा गाँव था, उसी गाँव में दो मित्र रहते थे। एक का नाम था गंगू और दूसरे का नाम छंगू था। गंगू चालक और बुद्धिमान था, क्योंकि वह पढ़ने जाता था, पर छंगू न ही चालाक था न ही बुद्धिमान। वह बिल्कुल अनपढ़ और भोला था, यहाँ तक की उसने स्कूल का मुंह भी नही देखा था। घर में गरीबी होने के कारण वह पढ़ न सका और छोटी उम्र में ही काम करने लगा। गंगू हमेशा छंगू के सामने अपना घमंड दिखाया करता था कि मै तुमसे कितना चालाक और बुद्धिमान हूँ, मगर छंगू कभी भी इन बातों का बुरा नही मानता था। वो कहता था हा यार मै अनपढ़ भला कैसे बुद्धिमान हो सकता हूँ समय के साथ धीरे -धीरे दोनों मित्र बड़े हो गए। एक दिन दोनों मित्रों ने आपस में बात की, कि चलो कंही घूमने चलते है। छंगू ने कहा कि चलो आज उस पास के जंगल में चलते है। दोनों मित्र टहलते-टहलते गाँव से दूर उस जंगल में आ गए, चारो तरफ़ घने पेड़ के जंगल थे। गर्मी बहुत तेज थी गंगू को तेज प्यास लगी, गंगू कहने लगा अगर थोडी देर में मुझे पानी नही मिला तो शायद मै प्यास से मर जाऊ। छंगू ने गंगू को एक पेड़ के छाये में लिटा दिया और ख़ुद पानी ढूढ़ने के लिए जंगल कि तरफ़ चल दिया। भटकते- भटकते आखिरकार वो एक कुएं के पास पहुँच ही गया। उस कुएं के पास के पेड़ पर दो बड़े राक्षस रहते थे। कुएं का पानी मुहं तक लबालब भरा था, छंगू को भी अब तक प्यास लग गई थी। वो झुक कर पानी पीने लगा, पानी पीने कि आवाज सुनकर पेड़ से दोनों राक्षस धड़ाम से जमीं पर कूद पड़े। छंगू अचानक आवाज सुनकर थोड़ा डर गया उसने पीछे देखा तो दो बड़े राक्षस खडे थे। दोनों राक्षस ने छंगू से पूछा कि तुम कौन हो और यंहा पर क्या कर रहे हो। छंगू बहादुर था उसने बिना डरे बताया कि मेरा नाम छंगू है, और मै पास के गाँव का रहन वाला हूँ। मै और मेरा दोस्त गंगू आज इधर घूमने आये थे। मेरा दोस्त अभी प्यास से बेहाल होकर पेड़ के पास पड़ा है, मै उसके लिए पानी लेने आया हूँ । छंगू के निडरता और दोस्त के लिए प्यार देखकर दोनों राक्षस बहुत खुश हुए , दोनों राक्षसों ने कहा कि हम दोनों भी दोस्त है और हम दोनों एक दूसरे के लिए जान भी दे सकते है। उन्होंने छंगू को एक बर्तन में पानी तथा ढेर सारे मिठाई, फल दिए, और कहा अपने दोस्त को खिलाना और हमेशा अच्छे दोस्त बनकर रहना। छंगू पानी और मिठाई लेकर गंगू के पास पंहुचा, उसे पानी पिलाया और फ़िर दोनों ने जमकर मिठाई औरफल खाया, साथ ही छंगू ने गंगू को उन दोनों राक्षस कि बात भी बताई कि किस तरह पानी लेते हुए वे दोनों भले राक्षस आ गए थे, और उन्होंने ने ये फल और मिठाई दिए। गंगू को कहानी सुनते - सुनते आँखों से आंसू आ गए कि किस तरह छंगू ने अपने जान की परवाह न करते हुए उसकी जान बचाई, साथ ही गर्व भी हुआ कि उसका दोस्त कितना बहादुर है। मगर अपने पर शर्मिंदा होने लगा कि मै किस तरह छंगू को नीचा दिखता था, और अपने पर घमंड करता था। गंगू रोते हुए अपने गलतियों के लिए छंगू से माफ़ी मांगने लगा, छंगू ने उसे गले लगाते हुए कहा धत पगले दोस्तों में माफ़ी मांगते है, इतना कहते-कहते छंगू के भी आँखों से आंसू टपकने लगे। दोनों दोस्त वापस अपने गाँव आये और खूब मजे से प्रेम पूर्वक रहने लगे।
लेखक: आदित्य कुमार
कविता: बकरी खाती खीरा ककड़ी
बकरी खाती खीरा ककड़ी
एक थी प्यारी बकरी,
खाती हरदम खीरा ककड़ी...
जब दिन आया मंगल,
वो भाग के पहुँची जंगल...
जंगल में मिले दो भालू,
दोनों खा रहे थे कच्चे आलू...
बकरी को खिलाया कच्चा आलू,
खाकर बकरी बन गई चालू...
भालू ने सोचा बकरी को खा लूँ,
नरम मुलायम मांस मै पा लूँ...
बकरी निकली बहुत ही चालू,
भालू को पिलाया जम के दारू...
दारू पीकर भालू बोला खीरा-खीरा,
बकरी ने झटपट भालू को चीरा...
भालू ने मरते ही बोला जय हो,
भैया बकरी से अब रखो भय हो...
सब भालू अब खाना खीरा ककड़ी,
जैसे हरदम खाती थी वो बकरी..
एक थी प्यारी बकरी,
खाती हरदम खीरा ककड़ी...
लेखक - सागर कुमार
सोमवार, नवंबर 8
कविता: बन्दर और कलेंडर
बन्दर और कलेंडर
आसमान में टंगा कलेंडर,
उसको पढ़ रहे थे हाथी बन्दर....
आसमान से गिरा जब बन्दर,
चिपका गया धरती के अन्दर
धरती के अन्दर थे तीन बन्दर,
तीनों ने मारे जम के थप्पड़ ...
बन्दर भगा किचन के अन्दर,
खाने लगा घी और मक्खन....
लेखक: मुकेश कुमार
कविता: सब्जी की गाड़ी
सब्जी की गाड़ी
आलू बैगन की थी गाड़ी,
उसमें बैठी दस सवारी...
पहिया बने थे धनिया भइया,
हार्न बनी थी लौकी...
स्टेरिंग बने थे कद्दू जी,
गेयर बनी थी मूली...
लाइट बने थे लाल टमाटर,
दिन में बैठे थे मुंह बंद कर...
जैसे ही अँधेरा घिर आता,
चलते थे अपना मुंह खोलकर...
सीट बने थे गोभी जी,
ड्राईवर बने थे शलजम जी....
एक दिन की हम बात बताएं,
सभी जरा सा गौर से सुनिए...
शाम को सूरज ढलने को आया,
चारो तरफ़ अँधेरा छाया...
आपस में दो गाड़ी लड़ गई,
एक दूजे से दोनों भिड गई
एक थी लकड़ी की गाड़ी,
दूजी थी सब्जी की गाड़ी...
सब्जी की गाड़ी टूट गई,
अलग - अलग वो छिटक गई...
सवारी सारे कूद पड़े थे,
गाड़ी से वे दूर खड़े थे...
सबने मिलकर सब्जी को उठाया,
घर ले जाकर सबको बिठाया...
घर में सबने सब्जी बनाया,
बच्चे बूढे सबने मिल खाया...
लेखक: आदित्य कुमार
रविवार, नवंबर 7
कविता: मेहनत का दर्द
मेहनत का दर्द
कच्ची कच्ची मिटटी खोदी ।खोदकर पानी में फुला दी ॥
गोल करके फिर सांचे में डाली ।
ईट हुई गड़बड़ मालिक ने दी गाली॥
गाली सुनकर गुस्सा आया ।
गुस्से को मन में भड़काया ॥
तब पता चला मालिक होते है कंजूस।
गाली देकर मन को पहुचाते है ठेस ॥
आदित्य कुमार
शनिवार, नवंबर 6
कविता : रविवार का दिन
रविवार का दिन
रविवार का दिन है कितना अच्छा,
बंद रहती है स्कूल की सभी कक्षा....
इस दिन रहती सभी की छुट्टी ,
बच्चा बच्चा सारा दिन करता मस्ती...
फिल्म देखना फुटबाल खेलना,
नाटक सीखना और दिखाना ...
इधर उधर खूब घूमने जाना ,
यही है दिन भर का दिनचर्या ...
रविवार का दिन है कितना अच्छा,
बंद रहती है स्कूल की सभी कक्षा...
रविवार का दिन है कितना अच्छा,
बंद रहती है स्कूल की सभी कक्षा....
इस दिन रहती सभी की छुट्टी ,
बच्चा बच्चा सारा दिन करता मस्ती...
फिल्म देखना फुटबाल खेलना,
नाटक सीखना और दिखाना ...
इधर उधर खूब घूमने जाना ,
यही है दिन भर का दिनचर्या ...
रविवार का दिन है कितना अच्छा,
बंद रहती है स्कूल की सभी कक्षा...
लेखक: धर्मेन्द्र कुमार
गुरुवार, नवंबर 4
सभी को दीपावली की हार्दिक बधाई
नमस्ते साथियों
आपको और आपके पूरे परिवार को बचपन के रंग के पूरे परिवार कि तरफ से दीपावली मुबारक हो,
दीपावली की अनेक अनेक शुभकामनाएं . ये दीपावली आप सब के जीवन में खुशियाँ ही
खुशियाँ लाये . आप सब का जीवन मंगलमय हो. यही दुआ है हमारी.
आपको और आपके पूरे परिवार को बचपन के रंग के पूरे परिवार कि तरफ से दीपावली मुबारक हो,
दीपावली की अनेक अनेक शुभकामनाएं . ये दीपावली आप सब के जीवन में खुशियाँ ही
खुशियाँ लाये . आप सब का जीवन मंगलमय हो. यही दुआ है हमारी.
कविता: एक किसान गया कलकत्ता
एक किसान गया कलकत्ता
एक किसान गया कलकत्ता।
उसने खाया पान का पत्ता॥
मुंह हो गया उसका लाल।
रात में किया मुर्गे को हलाल॥
जमकर उसने मुर्गा खाया।
किसी को घर में नही बताया॥
घर में मांस की बदबू आई।
उसकी पत्नी सह नही पाई॥
पत्नी उसकी पड़ी बीमार।
किसान ने मन में किया विचार॥
मांस कभी न खाऊँगा।
नहीं किसी को सताऊंगा॥
अबकी बार गया कलकत्ता।
नहीं खाऊँगा पान का पत्ता॥
लेखक: मुकेश कुमार
मंगलवार, नवंबर 2
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