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शनिवार, अप्रैल 30

बिठूर यात्रा - 2

यात्रा पर हम सभी ने बिठूर के बारे में कुछ नई बातें जानी आप भी जानिए.

कृपया फ्लिम प्ले करके देखे. 


शनिवार, जनवरी 15

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

..........................................हरिवंशराय बच्चन

शुक्रवार, दिसंबर 31

अपना स्कूल पनकी पड़ाव

सलाम साथियों


कल मै अपने नन्हे साथी चन्दन को लेकर पनकी पड़ाव के लिए निकला. हमारी मंजिल वहां पर जागृति बाल विकास समिति द्वारा चलाया जा रहा अपना स्कूल था, स्कूल पनकी पड़ाव में रहने वाले कुछ ऐसे परिवारों के लिए चलाया जा रहा था जो अपना गुजरा कबाड़ बिन कर और उनको बेच कर चलते थे. इस काम में उनका पूरा परिवार लगा रहता है.
जब हम स्कूल पहुंचे तो मुझे बिलकुल विश्वास नहीं हुआ कि ये सभी बच्चे कबाड़ बिनने का काम करते होंगे. सभी बच्चे बिलकुल साफ़ थे, सभी बहुत अच्छे लग रहे थे. हम लोग स्कूल में बैठे और आपस में एक दुसरे के साथ परिचय किया. तब मुझे पता चला कि वो सभी बच्चे असम के है और मुस्लिम समुदाय से है. बच्चों ने कवितायेँ सुनाई, मैंने भी उनको एक कहानी सुनाई, चन्दन ने भी उनको एक कविता सुनाई. इन्ही बच्चों में से पांच बच्चे करीब ३ किलोमीटर दूर से एक रिक्शे को खुद चलाकर पढने आते है. बच्चें अपने पढने के लिए सहायक सामग्री हरदास भाई के मार्गदर्शन में बनाते है, स्कूल में उनका खुद का शब्दकोष था, कविता की कापी थी जिसमें वो अपनी बनाई कविताएँ लिखते थे.
मैंने एक बच्चे से पूछा की तुम लोग पूरे दिन में क्या क्या करते हो. तो पता चला की बच्चे सुबह पांच बजे जागकर पढ़ते है, उसके बाद नहा- धोकर, अपना भोजन करते है और फिर अपने काम पर निकल जाते है. फिर करीब १ बजे तक वो लौट आते है. कभी कभी तो वो ७ किलोमीटर दूर एक क़स्बा कल्यानपुर तक चले जाते है. लेकिन वो अपने स्कूल के समय से पहले वापस आ जाते है, बच्चों ने बताया की सोमवार से लेकर शनिवार तक उनके पिता और माता उनको ज्यादा दूर तक कबाड़ बिनने नहीं जाने देते, ताकि वो अपनी पढाई के समय तक वापस आ जाये.
एक बच्ची जिसका नाम सलेहा है उसने कहा की भैया जी में आपको एक जादू देखाऊ, मै हाँ कर दी और सलेहा ने मुझे एक कागज दिया जो की काफी मुड़ा हुआ था और कहा भैया जी इसको खोलिए, जिससे ही मैंने उसको खोला उसमे से एक आवाज आई जो की शायद सभी को डरा सकती है और उसने मुझे भी डराया. मुझे ये जादू बहुत पसंद आया. बच्चों ने वो जादू मुझे दिया, मै अभी तक उसको आपने ५ साथियों को दिखा चुका हूँ, कागज खोलते समय उनका चेहरा देखने लायक ही होता है.
बच्चों को कबाड़ में मिलने वाली काम की चीजो को वो अपने काम के प्रयोग  में लाते है. बच्चे हर शनिवार को बाल सभा करते है, जिसमें वो एक दुसरे की परेशानी के ऊपर भी बात करते थे, चित्र बनाते थे, कविता लिखते थे.
मुझे ये स्कूल और यहाँ के बच्चे बहुत अच्छे लगे क्योकि वो अपने काम के साथ साथ ही अपनी पढाई भी बहुत अच्छे से कर रहे है. हरदास भाई  सिर्फ गिनती, भाषा ही नहीं सिखाते  है बल्कि कैसे अपने जीवन को बेहतर बनाए ये भी सिखाते है. हरदास भाई और सभी बच्चों को हमारा सलाम.

बच्चों की कवितायेँ सुनाने के लिए लिंक पर क्लिक करे.
http://www.youtube.com/watch?v=ma6G80J-efg





आपका
दीन दयाल और चन्दन

बुधवार, दिसंबर 15

कविता हो गयी दिकत ख़त्म

हो गयी दिकत ख़त्म

आज के विज्ञान ने सब कुछ नापा है ,
आकाश को तक नहीं छोड़ा.....
सागर और धरती को पता नहीं,
उसने कैसे नापा है.....
छोटे -छोटे आणुओं से मिल कर,
न जाने कितने पदार्थ बनाया......
मानव उनका करता है उपयोग,
कभी न होता उनका सदुपयोग.......
जिससे बड़ी आसानी से होता कार्य,
कभी न होती उनमे दिकत.......
बड़े -बड़े आविष्कार हुए है,
जिनका बड़ा उपयोग हुआ है........
आज के विज्ञान ने सब कुछ नापा है,
आकाश को तक नहीं छोड़ा.......
लेखक अशोक कुमार

बुधवार, नवंबर 24

कहानी : हरहर सिंह की तरकीब


हरहर सिंह की तरकीब
प्राचीन काल की बात है की एक राजा किसी नगर में राज्य करता था वह बड़ा ही निर्दयी और क्रूर और हरदम दुखी रहने वाला राजा था वह लोगो को हमेशा सताया और डराया करता था वह सभी लोगो से अपने खेतों में काम करवाता था और काम के बदले जो भी पैसा तय करता उतने देकर उससे बहुत ही काम पैसे देता था, मजदूर जब अपने पैसे मांगते थे तो उनकी पिटाई करता और उन्हें जेल में डाल देता इस तरह से राजा नगर के लोगों को सताया करता था उसी नगर में हरहर सिंह नाम काल एक नौजवान रहता था उसकी उम्र लगभग २८ वर्ष थी, वह कुछ पढ़ा लिखा था और बहुत समझदार भी था जब उसे पता चला की राजा नगर के वासियों के साथ दुर्व्यवहार कर रहा है, तो हर हर सिंह ने लोगों को बुलाकर एक बैठक की और उन्हें समझाया कि हम लोगों को स्वतन्त्रता पूर्वक जीवन जीने का अधिकार है और हम लोगो से कोई जबरदस्ती करके काम नही ले सकता है मगर हम लोगों को अपने अधिकार लेने के लिए एक साथ संगठित और शिक्षित होकर संघर्ष कारन पड़ेगा तब हमें अपना अधिकार मिलेगा हमें अपना अधिकार तब मिलेगा सब हम सभी राजा के पास चलाकर इस अन्याय का विरोध करे और हम स्वतंत्रता पूर्वक जीवन जीने का अधिकार मांगे बैठक के बाद कुछ लोगो राजा के पास जाकर विरोध करने के लिए तैयार ही गए, मगर कुछ लोगो राजा के डर से इस विरोध में शामिल नही हो रहे थे हर हर सिंह ने उन लोगों को फ़िर से खूब समझाया कि राजा तुम्हारा कुछ नही कर सकता है करेगा, इसलिए आप सभी इस संघर्ष में शामिल हो... ये तुम्हारा अधिकार है अगर आप नहीं लोगो तो वो कौन लेगा, तुम्हे अपना अधिकार लेने के लिए राजा का विरोध करना चाहिए, अगर नही करोगे तो तुम्हे अधिकार नही मिलने वाला है इतन कहते ही सभी नगर वासी संघर्ष के लिए तैयार हो गए औए अगले दिन राजा के राजा के दरबार में विरोध करने पहुँच गए और अपने अधिकार के मांग को लेकर नारे लगाने लगे राजा सभी नगरवासियों को इकठ्ठा देख कर डर गया वो सोचने लगा कि कंही सभी मिलकर हमें पीटने लगे राजा सभी से बातचीत करने लगा और उसने नगरवासियों से कहा कि मै ग़लत था आप सबसे अपनी गलतियों के लिए माफ़ी चाहता हूँ आज से आप सभी अपने मर्जी से काम का समय तय करेंगे और जो भी मजदूरी आप सभी मिल कर तय करेंगे वो मजदूरी आपको पूरी कि पूरी मिलेगी और राजा ने उनके सभी अधिकार दिए नगर के लोगो इस जीत से बहुँत ही खुश हुए नगरवासियों ने हरहर सिंह को इस जीत के लिए धन्यवाद् दिया और खूब बधाइयां दी हरहर सिंह कि तरकीब देखकर राजा बहुँत ही प्रभावित हुआ राज ने भी निर्दयता, क्रूरता, सताना और डरना छोड़कर लोगो के साथ अच्छा ब्यवहार करने लगा राजा अब सभी के साथ खेतो में जाकर ख़ुद काम करने लगा सभी लोगो के साथ मिलकर उनके साथ प्रेमपूर्वक जीने लगा इस प्रकर अब नगर के सभी लोग हरहर सिंह के साथ खुशी से रहने लगे साथ में अब राजा भी बहुत खुश रहने लगा....
लेखक : आदित्य कुमार

मंगलवार, नवंबर 23

कविता: बिन डंडो की शिक्षा कब तक लायेंगें

बिन डंडो की शिक्षा कब तक लायेंगें


हमको तो सब कुछ याद है,
अब तो मार खायेंगे...
जो कुछ याद नही है,
उसे तो बिल्कुल रट लेंगे...
अब होने को है पेपर उसमे लिख देंगे,
जो भी देंगे उसको हल कर देंगे...
ये सब याद हुआ है डंडे के बल पे,
टीचर तो बैठे रहते कुर्सी पे...
हाथ में हरदम ले कर डंडे,
मार से रोज टूटे कितने डंडे...
भोले भाले और मुस्काते सारे बच्चे आते है,
रात को रटते सुबह भूल ही जाते है...
डंडे खाते फिर याद करते,
रोते रोते घर को जाते....
डंडे के बल पर हम कब तक पढ़ पाएंगे,
क्या कोई अब प्यारे टीचर आयेंगे....
बिन मारे क्या हम नही पढ़ पाएंगे,
बिन डंडो की शिक्षा कब तक लायेंगे....
लेखक: अशोक कुमार

शुक्रवार, नवंबर 19

कविता: चूहे राजा की रानी

चूहे राजा की रानी


एक चूहे की तीन रानी,
तीनों रानी बड़ी सयानी ...
एक थी कानी पर कोयल जैसी बाणी,
बाते करती ऐसी जैसी सबकी हो नानी...
एक थी लगडी सर पर डाले पगड़ी,
हट्टी -कट्टी और थी मोटी तगड़ी...
एक थी सीधी -साधी प्यारी सी,
राजा को लगती राजकुमारी सी...
दोनों रानी इस बात से चिढ़ती थी,
राज के कान को भरती थी...
एक दिन दोनों राजा के उपर गिर गई,
राजा की पूछ उनके वजन से दब गई...
कानी लगडी का वजन था ज्यादा,
चूहे राजा को याद आ गए दादा ...
दर्द ने राजा के गुस्से को भड़काया,
राजा ने रानी को घर से मार भगाया...
लेखक: आदित्य कुमार

गुरुवार, नवंबर 18

बच्चों को कोचिंग पढने के लिए मजबूर करते अध्यापक


बच्चों को कोचिंग पढने के लिए मजबूर करते अध्यापक

कक्षा सात की बात है| हम सभी लोग उस समय पहली बार किसी सरकारी स्कूल में गए थे, इससे पहले हम सब कभी किसी सरकारी स्कूल में नहीं गए थे | उस स्कूल के अध्यापकों के विषय में ज्यादा जानकारी नहीं थी | जैसे ही हम लोग अपनी - अपनी कक्षा में गए, वैसे ही कुछ लड़के हम लोगों के पास मिलने आये और बातचीत करने लगे और अध्यापकों के मारने के विषय में बताने लगे, पर हम लोगों को उन लड़कों की बातों पर यकीन नहीं हो रहा था | कुछ समय के बाद पढाई शुरु हुई, गणित के अध्यापक गणित के सवाल बोर्ड में लगवा रहे थे कि एक लड़के ने अध्यापक जी से पूंछ लिया कि सर ये सवाल कैसे लगाया है ? फिर से बता दीजिये ताकि मुझे समझ में जाये | अध्यापक जी ने उसे अपने पास बुलाया और उसे दो थप्पड़ मारे और उससे कहने लगे कि ज्यादा समझना है तो कोचिंग में पढ़ने आना समझे , और कहा कि चुप - चाप जाकर अपनी सीट में बैठ जाओ | तब जाकर मुझे उन लड़कों की बातों पर यकीन हुआ कि वाकई में यह स्कूल एक डेंजर स्कूल है | मन में ये भी सवाल उठता है कि सरकारी मोटी वेतन पाने वाले ये अध्यापकों का कब पेट भरेगा ? सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले हम बच्चों का ये शोषण करना कब बंद करेंगे। . हम जैसे गरीब बच्चों को अच्छी शिक्षा, इन सरकारी स्कूलों में क्या कभी मिल सकेगी .......


आदित्य कुमार