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शनिवार, अप्रैल 23

लगता है मै आदमी हूँ..................


लगता है मै आदमी हूँ
मेरे दो हाथ दो पैर है
एक सर और एक पेट है
लगता है मै आदमी हूँ ....
पेट को देखने के लिए
मै सिर को झुकता हूँ,
पेट को देखने के लिए
काम पर जाता हूँ
और बहस करता हूँ रोटी के लिए......
पर यंहा भी,
पेट को देखने के लिए
सिर को झुकता हूँ रोज़....
सुबह झुकाता हूँ, शाम झुकाता हूँ
शाम को पेट गढ्ढा नजर आता है...
एक आग सी दिखाई देती है
आग को आग से बुझाता हूँ
लगता है मै आदमी हूँ.....
लगता है वह भी आदमी है ???
उसके भी दो हाथ दो पैर एक सिर
और एक पेट है....
उसे काम पर नही जाना होता
उसे रेट पर बहस नही करना होता
उसे पेट को देखने के लिए
सिर को झुकाना नही होता
क्यों की पेट ख़ुद-बा-ख़ुद सिर को
देखता है...
लगता है की मै आदमी हूँ....

.....किसान का व्यास

बाल कविता : एक मकान में चार दुकान।

एक मकान में चार दुकान।
बनते थे सब में पकवान।।
चारो दुकानों में मोटे हलवाई।
करते रहते दिन रात लड़ाई॥
लड़ाई में क्या होते थे मुद्दे।
दुकान में सौदे हो जाते थे मद्दे ॥
चारो दुकानों में सन्डे को होता था अवकाश।
उस दिन चारों हलवाई नहीं करते थे बकवास॥
एक मकान में चार दुकान।
बनते थे सब में पकवान॥

लेखक : ज्ञान कुमार
कक्षा : सात

सोमवार, नवंबर 29

कविता: भालू भइया मंत्री बन गए .....

भालू भइया मंत्री बन गए


जंगलवासी सुनो एक ख़बर,
करना ना कोई अगर - मगर....
लोमड़ी एक दिन रोती आई,
शेर से अपनी बात बताई....
शेर ने पूछा क्या हो गया,
लोमड़ी बोली पूँछ कट गया....
शेर ने झट डाक्टर बुलवाया,
दौड़ के डाक्टर जल्दी आया....
डाक्टर थे भाई भालू लाला,
ढूंढ़ के फेविक्युक ले आया....
झट से उसके पूँछ में लगाई,
लोमड़ी रानी खूब चिल्लाई....
उसकी झट से पूँछ जुड गई,
डाक्टर भालू की चर्चा फ़ैल गई....
शेर राजा झूम के गाये,
लोमड़ी रानी खुशी से नाचे....
शेर राजा खुश हो गए,
भालू भइया मंत्री बन गए....
जंगलवासी सुनो एक ख़बर,
करना ना कोई अगर - मगर....
लेखक: मुकेश कुमार

बुधवार, नवंबर 24

कहानी : हरहर सिंह की तरकीब


हरहर सिंह की तरकीब
प्राचीन काल की बात है की एक राजा किसी नगर में राज्य करता था। वह बड़ा ही निर्दयी और क्रूर और हरदम दुखी रहने वाला राजा था। वह लोगो को हमेशा सताया और डराया करता था। वह सभी लोगो से अपने खेतों में काम करवाता था और काम के बदले जो भी पैसा तय करता उतने न देकर उससे बहुत ही काम पैसे देता था, मजदूर जब अपने पैसे मांगते थे तो उनकी पिटाई करता और उन्हें जेल में डाल देता। इस तरह से राजा नगर के लोगों को सताया करता था। उसी नगर में हरहर सिंह नाम काल एक नौजवान रहता था। उसकी उम्र लगभग २८ वर्ष थी, वह कुछ पढ़ा लिखा था और बहुत समझदार भी था। जब उसे पता चला की राजा नगर के वासियों के साथ दुर्व्यवहार कर रहा है, तो हर हर सिंह ने लोगों को बुलाकर एक बैठक की और उन्हें समझाया कि हम लोगों को स्वतन्त्रता पूर्वक जीवन जीने का अधिकार है और हम लोगो से कोई जबरदस्ती करके काम नही ले सकता है। मगर हम लोगों को अपने अधिकार लेने के लिए एक साथ संगठित और शिक्षित होकर संघर्ष कारन पड़ेगा तब हमें अपना अधिकार मिलेगा। हमें अपना अधिकार तब मिलेगा सब हम सभी राजा के पास चलाकर इस अन्याय का विरोध करे और हम स्वतंत्रता पूर्वक जीवन जीने का अधिकार मांगे। बैठक के बाद कुछ लोगो राजा के पास जाकर विरोध करने के लिए तैयार ही गए, मगर कुछ लोगो राजा के डर से इस विरोध में शामिल नही हो रहे थे । हर हर सिंह ने उन लोगों को फ़िर से खूब समझाया कि राजा तुम्हारा कुछ नही कर सकता है न करेगा, इसलिए आप सभी इस संघर्ष में शामिल हो... ये तुम्हारा अधिकार है अगर आप नहीं लोगो तो वो कौन लेगा, तुम्हे अपना अधिकार लेने के लिए राजा का विरोध करना चाहिए, अगर नही करोगे तो तुम्हे अधिकार नही मिलने वाला है। इतन कहते ही सभी नगर वासी संघर्ष के लिए तैयार हो गए। औए अगले दिन राजा के राजा के दरबार में विरोध करने पहुँच गए और अपने अधिकार के मांग को लेकर नारे लगाने लगे। राजा सभी नगरवासियों को इकठ्ठा देख कर डर गया वो सोचने लगा कि कंही सभी मिलकर हमें पीटने न लगे। राजा सभी से बातचीत करने लगा और उसने नगरवासियों से कहा कि मै ग़लत था आप सबसे अपनी गलतियों के लिए माफ़ी चाहता हूँ । आज से आप सभी अपने मर्जी से काम का समय तय करेंगे और जो भी मजदूरी आप सभी मिल कर तय करेंगे वो मजदूरी आपको पूरी कि पूरी मिलेगी और राजा ने उनके सभी अधिकार दिए। नगर के लोगो इस जीत से बहुँत ही खुश हुए। नगरवासियों ने हरहर सिंह को इस जीत के लिए धन्यवाद् दिया और खूब बधाइयां दी। हरहर सिंह कि तरकीब देखकर राजा बहुँत ही प्रभावित हुआ। राज ने भी निर्दयता, क्रूरता, सताना और डरना छोड़कर लोगो के साथ अच्छा ब्यवहार करने लगा । राजा अब सभी के साथ खेतो में जाकर ख़ुद काम करने लगा सभी लोगो के साथ मिलकर उनके साथ प्रेमपूर्वक जीने लगा। इस प्रकर अब नगर के सभी लोग हरहर सिंह के साथ खुशी से रहने लगे साथ में अब राजा भी बहुत खुश रहने लगा....
लेखक : आदित्य कुमार

मंगलवार, नवंबर 23

कविता: बिन डंडो की शिक्षा कब तक लायेंगें

बिन डंडो की शिक्षा कब तक लायेंगें


हमको तो सब कुछ याद है,
अब तो न मार खायेंगे...
जो कुछ याद नही है,
उसे तो बिल्कुल रट लेंगे...
अब होने को है पेपर उसमे लिख देंगे,
जो भी देंगे उसको हल कर देंगे...
ये सब याद हुआ है डंडे के बल पे,
टीचर तो बैठे रहते कुर्सी पे...
हाथ में हरदम ले कर डंडे,
मार से रोज टूटे कितने डंडे...
भोले भाले और मुस्काते सारे बच्चे आते है,
रात को रटते सुबह भूल ही जाते है...
डंडे खाते फिर याद करते,
रोते रोते घर को जाते....
डंडे के बल पर हम कब तक पढ़ पाएंगे,
क्या कोई अब प्यारे टीचर आयेंगे....
बिन मारे क्या हम नही पढ़ पाएंगे,
बिन डंडो की शिक्षा कब तक लायेंगे....
लेखक: अशोक कुमार

सोमवार, नवंबर 15

कविता: थाली और गिलास

थाली और गिलास


एक थी थाली एक था गिलास,
खाने में मिलते हरदम साथ...
हर घर में वे रहते साथ,
एक दूजे से करते बात...
एक दिन थाली की आई बारात,
चम्मच कटोरी जमके नाचे साथ...
दूल्हा बन ठुमके थे गिलास,
दोनों की शादी हो गई साथ...
एक थी थाली एक था गिलास,
खाने में मिलते हरदम साथ
....
लेखक: जमुना कुमार

शनिवार, नवंबर 13

कविता: जल का न करे दुरूपयोग

जल का न करे दुरूपयोग


जल ही जीवन है हम सबका,
कभी न करे दुरूपयोग इसका....
जल बिन जीवन होगा कैसा,
बंजर धरती बिन प्राणी जैसा....
आओ हम मिल सरंक्षण करे इसका,
जल ही जीवन है हम सबका....
आओ मिल पानी की बूंद बचाए हम,
जीवन के सबको सुखी बनाये हम....
जल के दुरूपयोग को मिल रोके हम,
दुनिया के जीवन आगे बढाये हम....
जल का है महत्त्व बड़ा,
इससे ही हर चीज खड़ा...
जल का हम सब करते उपयोग,
इसलिए कभी न करे इसका दुरूपयोग.....
लेखक: धर्मेन्द्र कुमार

कविता: खाई गधे की लात

खाई गधे की लात


एक लड़का जिसका नाम था सोहन,
वो दिन रात करता था आलसीपन...
कुछ दिन बाद आया जाड़ा,
खूब याद किया उसने पहाड़ा...
एक दिन घर में बैठा वो अन्दर,
अपनी जेब में रखे चुकंदर...
जमके उसने चुकंदर खाया,
दायें बाएं जो भी पाया....
चुकंदर में थे बड़े- बड़े कीड़े,
सोहन के पेट में पड़ गए कीड़े....
सोहन फ़िर तो चला बाज़ार,
गधे पर हुआ जमके सवार....
अक्ल से था वो निपट गंवार,
बिन के लगाम के हुआ सवार....
गधे ने फ़िर मारी लात ,
सोहन ने खाई चार गुलाट....
लेखक: मुकेश कुमार

गुरुवार, नवंबर 11

कविता: मोटा-मोटी

मोटा-मोटी

एक था मोटा, एक थी मोटी,
खाते थे, दोनों दस-दस रोटी।
एक दिन उनके घर आए मेहमान,
बोले लगी है भूख कराओ खान-पान।
मोटी थी बड़ी आलसी और खोटी,
बोली घर में बनी नही है रोटी।
चट से बोली आटा रखा है घर में,
झट से पका लो रोटी चूल्हे में।
अभी नींद लगी है, इसलिए मुझे है सोना,
पक जाए अगर रोटी, तो मुझे जगा देना।
लेखक: आदित्य कुमार

मंगलवार, नवंबर 9

कहानी: दो दोस्त और जंगल का राक्षस

दो दोस्त और जंगल का राक्षस


बहुत समय पहले की बात है की एक छोटा सा गाँव था, उसी गाँव में दो मित्र रहते थे। एक का नाम था गंगू और दूसरे का नाम छंगू था। गंगू चालक और बुद्धिमान था, क्योंकि वह पढ़ने जाता था, पर छंगू न ही चालाक था न ही बुद्धिमान। वह बिल्कुल अनपढ़ और भोला था, यहाँ तक की उसने स्कूल का मुंह भी नही देखा था। घर में गरीबी होने के कारण वह पढ़ न सका और छोटी उम्र में ही काम करने लगा। गंगू हमेशा छंगू के सामने अपना घमंड दिखाया करता था कि मै तुमसे कितना चालाक और बुद्धिमान हूँ, मगर छंगू कभी भी इन बातों का बुरा नही मानता था। वो कहता था हा यार मै अनपढ़ भला कैसे बुद्धिमान हो सकता हूँ समय के साथ धीरे -धीरे दोनों मित्र बड़े हो गए। एक दिन दोनों मित्रों ने आपस में बात की, कि चलो कंही घूमने चलते है। छंगू ने कहा कि चलो आज उस पास के जंगल में चलते है। दोनों मित्र टहलते-टहलते गाँव से दूर उस जंगल में आ गए, चारो तरफ़ घने पेड़ के जंगल थे। गर्मी बहुत तेज थी गंगू को तेज प्यास लगी, गंगू कहने लगा अगर थोडी देर में मुझे पानी नही मिला तो शायद मै प्यास से मर जाऊ। छंगू ने गंगू को एक पेड़ के छाये में लिटा दिया और ख़ुद पानी ढूढ़ने के लिए जंगल कि तरफ़ चल दिया। भटकते- भटकते आखिरकार वो एक कुएं के पास पहुँच ही गया। उस कुएं के पास के पेड़ पर दो बड़े राक्षस रहते थे। कुएं का पानी मुहं तक लबालब भरा था, छंगू को भी अब तक प्यास लग गई थी। वो झुक कर पानी पीने लगा, पानी पीने कि आवाज सुनकर पेड़ से दोनों राक्षस धड़ाम से जमीं पर कूद पड़े। छंगू अचानक आवाज सुनकर थोड़ा डर गया उसने पीछे देखा तो दो बड़े राक्षस खडे थे। दोनों राक्षस ने छंगू से पूछा कि तुम कौन हो और यंहा पर क्या कर रहे हो। छंगू बहादुर था उसने बिना डरे बताया कि मेरा नाम छंगू है, और मै पास के गाँव का रहन वाला हूँ। मै और मेरा दोस्त गंगू आज इधर घूमने आये थे। मेरा दोस्त अभी प्यास से बेहाल होकर पेड़ के पास पड़ा है, मै उसके लिए पानी लेने आया हूँ । छंगू के निडरता और दोस्त के लिए प्यार देखकर दोनों राक्षस बहुत खुश हुए , दोनों राक्षसों ने कहा कि हम दोनों भी दोस्त है और हम दोनों एक दूसरे के लिए जान भी दे सकते है। उन्होंने छंगू को एक बर्तन में पानी तथा ढेर सारे मिठाई, फल दिए, और कहा अपने दोस्त को खिलाना और हमेशा अच्छे दोस्त बनकर रहना। छंगू पानी और मिठाई लेकर गंगू के पास पंहुचा, उसे पानी पिलाया और फ़िर दोनों ने जमकर मिठाई औरफल खाया, साथ ही छंगू ने गंगू को उन दोनों राक्षस कि बात भी बताई कि किस तरह पानी लेते हुए वे दोनों भले राक्षस आ गए थे, और उन्होंने ने ये फल और मिठाई दिए। गंगू को कहानी सुनते - सुनते आँखों से आंसू आ गए कि किस तरह छंगू ने अपने जान की परवाह न करते हुए उसकी जान बचाई, साथ ही गर्व भी हुआ कि उसका दोस्त कितना बहादुर है। मगर अपने पर शर्मिंदा होने लगा कि मै किस तरह छंगू को नीचा दिखता था, और अपने पर घमंड करता था। गंगू रोते हुए अपने गलतियों के लिए छंगू से माफ़ी मांगने लगा, छंगू ने उसे गले लगाते हुए कहा धत पगले दोस्तों में माफ़ी मांगते है, इतना कहते-कहते छंगू के भी आँखों से आंसू टपकने लगे। दोनों दोस्त वापस अपने गाँव आये और खूब मजे से प्रेम पूर्वक रहने लगे।
लेखक: आदित्य कुमार

सोमवार, नवंबर 8

कविता: बन्दर और कलेंडर

बन्दर और कलेंडर


आसमान में टंगा कलेंडर,
उसको पढ़ रहे थे हाथी बन्दर....
आसमान से गिरा जब बन्दर,
चिपका गया धरती के अन्दर
धरती के अन्दर थे तीन बन्दर,
तीनों ने मारे जम के थप्पड़ ...
बन्दर भगा किचन के अन्दर,
खाने लगा घी और मक्खन....
लेखक: मुकेश कुमार

कविता: सब्जी की गाड़ी

सब्जी की गाड़ी


आलू बैगन की थी गाड़ी,
उसमें बैठी दस सवारी...
पहिया बने थे धनिया भइया,
हार्न बनी थी लौकी...
स्टेरिंग बने थे कद्दू जी,
गेयर बनी थी मूली...
लाइट बने थे लाल टमाटर,
दिन में बैठे थे मुंह बंद कर...
जैसे ही अँधेरा घिर आता,
चलते थे अपना मुंह खोलकर...
सीट बने थे गोभी जी,
ड्राईवर बने थे शलजम जी....
एक दिन की हम बात बताएं,
सभी जरा सा गौर से सुनिए...
शाम को सूरज ढलने को आया,
चारो तरफ़ अँधेरा छाया...
आपस में दो गाड़ी लड़ गई,
एक दूजे से दोनों भिड गई
एक थी लकड़ी की गाड़ी,
दूजी थी सब्जी की गाड़ी...
सब्जी की गाड़ी टूट गई,
अलग - अलग वो छिटक गई...
सवारी सारे कूद पड़े थे,
गाड़ी से वे दूर खड़े थे...
सबने मिलकर सब्जी को उठाया,
घर ले जाकर सबको बिठाया...

 घर में सबने सब्जी बनाया,
बच्चे बूढे सबने मिल खाया...



लेखक: आदित्य कुमार

गुरुवार, नवंबर 4

कविता: एक किसान गया कलकत्ता

एक किसान गया कलकत्ता


एक किसान गया कलकत्ता।
उसने खाया पान का पत्ता॥
मुंह हो गया उसका लाल।
रात में किया मुर्गे को हलाल॥
जमकर उसने मुर्गा खाया।
किसी को घर में नही बताया॥
घर में मांस की बदबू आई।
उसकी पत्नी सह नही पाई॥
पत्नी उसकी पड़ी बीमार।
किसान ने मन में किया विचार॥
मांस कभी न खाऊँगा।
नहीं किसी को सताऊंगा॥
अबकी बार गया कलकत्ता।
नहीं खाऊँगा पान का पत्ता॥

लेखक: मुकेश कुमार

रविवार, अक्टूबर 31

कविता: कंप्यूटर भाई

कंप्यूटर भाई

कंप्यूटर भाई कंप्यूटर भाई।
तुम क्यो होतो हो हमसे गुस्सा॥
गुस्सा तुमको अब नही करना है।
हमारा काम अब तुमको करना है॥
कंप्यूटर भाई कंप्यूटर भाई।
तुम कहाँ चले गए॥
बिजली गई तो तुम भी गए।
मेरा काम अधूरा छोड़ गए॥
तुम्हारे सहारे सब काम चल रहा है।
तुम ही हो मेरे काम के साथी॥
अब साथ- साथ तुम्हे रहना है।
अब मेरा काम भी करना है॥
कंप्यूटर भाई कंप्यूटर भाई।
तुम क्यो होतो हो हमसे गुस्सा॥

लेखक : सागर कुमार