लुटने वालों, तुम लुटते रहो,
हम तो चुपचाप सब देखेंगे...
तुम से ही ये देश चल रहा है,
तुम पर ही ये अर्थव्यस्था टिकी है.....
पर अरे ये क्या हुआ कुछ लूटने वाले पकडे गए,
कुछ गड़बड़ी पकड़ी गयी...
अरे - अरे देखो देश की अर्थव्यस्था गिर रही है,
देश का विकास तो रुक सा ही गया...
सत्यानाश हो इन लूटने वालों को पकड़ने वालों का,
देश को पीछे धकेलने वालों का....
एक मकान में चार दुकान।
बनते थे सब में पकवान।।
चारो दुकानों में मोटे हलवाई।
करते रहते दिन रात लड़ाई॥
लड़ाई में क्या होते थे मुद्दे।
दुकान में सौदे हो जाते थे मद्दे ॥
चारो दुकानों में सन्डे को होता था अवकाश।
उस दिन चारों हलवाई नहीं करते थे बकवास॥
एक मकान में चार दुकान।
बनते थे सब में पकवान॥