गुरुवार, सितंबर 20

मेरी कविता - बकरी

मेरी बकरी काली काली,
सीधी-सीधी भोली-भली।
इसकी तो हर बात निराली,
खाकर पत्ते करे जुगाली।
दूध इसका मीठा-मीठा, 
मुन्ना इसका बहुत अनूठा।

 कवि - काजीमुददीन
अपना स्कूल पनकी पड़ाव


रविवार, सितंबर 2

मेरी कविता - कुत्ता

मैंने झबरा कुत्ता पाला,
घर का सच्चा रखवाला।
भला बुरा यह सब कुछ जाने,
 चोरों को फ़ौरन पहचाने।
--- कजुमिदीन अपना स्कूल, पनकी पड़ाव 


शुक्रवार, अगस्त 31

मेरे चित्र

एक बच्ची ने एक बुजुर्ग को रस्ते पर लोगों से कुछ मांगते हुए देखा और वह उसको रोज देखती थी . एक दिन उस बच्ची ने अपने कला करने के समय में उस बुजुर्ग का चित्र बनाने की कोशिश की।


गुरुवार, जून 7

35 लाख रुपये खर्चा

योजना आयोग का दफ्तर में हगने और मूतने के लिए 35 लाख रुपये खर्चा हो जाते है, और आम जनता को रहने के लिए एक झोपड़ी नसीब नहीं हो रही है. योजना आयोग के पदाधिकारी इस खर्च को सही बता रहे है. एक तरफ ये गाँव में शौचालय 1000 रुपये में बना देते है और दूसरी तरफ 35 लाख रुपये ये तो गलत बात है. काम दोनों में एक ही होना है, पर काम करने वाले अलग है. अब हमें तय करना है की जिस देश में लोग  भूख से मर रहे हो, जिस देश में किसान आत्महत्या कर रहा हो, जिस देश में लाखों युवा बेरोजगार है उस देश की विकास  के लिए योजना बनाने वाले कहाँ मूतेंगे और कहाँ हगेंगे ? चिंता मत करो जिस दिन देश की जनता हिसाब मागेगी उस दिन इनको दोनों  के लिए खेत भी नसीब नहीं होगा.





शुक्रवार, अप्रैल 27

स्रष्टि बीज कहा नाश नाश न हो हर मौसम की तयारी है,

स्रष्टि बीज कहा नाश नाश न हो हर मौसम की तयारी है,
कल का गीत लिए होठो पर, आज लड़ाई जारी है।
आज लड़ाई जारी है................

हर आगन का बुढा सूरज, परचम परचम दहक उठा,
काल सिंधु के ज्वार परिश्रम, के फूलो से महक उठा।
नाश और निर्माण जवानी की निश्छल किलकारी है,
कल का गीत लिए होठों पर आज लड़ाई जारी है।
आज लड़ाई जारी है................


स्रष्टि बीज कहा नाश नाश न हो हर मौसम की तयारी है,
कल का गीत लिए होठो पर, आज लड़ाई जारी है।
आज लड़ाई जारी है................


जंजीरों से शुब्ध युगों तक प्रणय गीत से रणभेरी ,
मुक्ति प्रिया की पग ध्वनी लेकर घर घर लगा रही फेरी।
हेर नारे में महाकाव्य के स्राजन्कर्म की बारी है,
कल का गीत लिए होठो पर, आज लड़ाई जारी है।
आज लड़ाई जारी है................


स्रष्टि बीज कहा नाश नाश न हो हर मौसम की तयारी है,
कल का गीत लिए होठो पर, आज लड़ाई जारी है।
आज लड़ाई जारी है................
.....महेशवर
संकलन: समर तो शेष है....

गुरुवार, अप्रैल 26

चिंता रहती है....

वीरों को - आन की
नाविक को - तूफ़ान की
मुसाफिर को - सामान की
भिखारी को - दान की
ऋषि को - वरदान की
कंजूस को - मेहमान की
गायक को - तान की
छात्र को - इम्तेहान की
पंक्षी को - उड़ान की
प्रोफ़ेसर को - बखान की
आमिर को - शान की
किसान को - लगान की
नेता को - मतदान की
भगवान को - जहान की
शराबी को - शुरापान की
ड्राईवर को - चालान की
कायर को - जान की
कमज़ोर को - बलवान की
व्यापारी को - नुकशान की
माँ-बाप को - संतान की 

---  शैलेन्द्र शील पाठक

बुधवार, अप्रैल 18

कविता - सब कुछ बदल गया....

ये दुनिया बदल गयी,
ये जहाँ बदल गया ।
आज के इस संसार में,
ये इन्सान ही बदल गया ।

आज नेताओं और लोगों के चरित्र,
बदल गए ।
भ्रष्टाचारी इस देश में,
गरीबी के मायने बदल गए ।

नेता वोटों के खातिर,
जाने क्या क्या वादे कर गए ।
वादों को भी न पूरा किया,
पर अपनी झोली ये भर ले गए ।   

कवि : धर्मेन्द्र कुमार

सोमवार, दिसंबर 26

एक लघुकथा - विनती

साढ़े छह साल की उम्र में होटल में काठ की टेबल पर पोछा लगाने के काम से अपना कैरियर शरू किया. कुछ समय बाद ग्राहकों के गिलास पकड़ने लगा, फिर उनके आगे सलीके से प्लेट भी रखने लगा. शुरू में उसे थोड़े सिक्के मिलते थे बाद में कागज के नोट मिलने लगा. उसका मालिक उसपर एतबार जरा कम करता था. यह दुकान में आने-जाने वालों का विशेष ख्याल रखने लगा. फटाफट आर्डर लेना, उसे पूरा करना तथा ग्राहकों का बिल मालिक को बताने लगा, जिसके कारण लेन-देन में पहले से सुविधा हो गयी. बाल-दिवस से एक दिन पहले टेबल पर पोछा लगाते हुए शानदार पोज में कोई फोटोग्राफर एक क्लिक के साथ उसका फोटो उड़ा ले गया. धुल-गरदा फांक रही कई राजनैतिक पार्टियों और राजनेताओं में नई जा आ गयी. संसद और विधानसभा में भारी हंगामा हुआ. विपक्षी पार्टियाँ अपनी जगह कायम रही. काम ठप रहा. आकडेबाजों ने करोड़ों का नुकशान बताया. राजनैतिक पंडितों ने देश की मौजूदा हालत पर गंभीर चिंता प्रकट की. सरकार से लेकर अखबार तक कई दिनों तक इस मुद्दे पर हायतौबा मची रही. फिर धीरे-धीरे सब शांत पड़ गया.

वह दिन भर होटल में जूठे-प्लेट्स और पोंछा के काम में बिजी रहता. देर शाम को मालिक से कल सुबह जल्दी आने की बात कहकर तेजी से घर की रह पकड़ लेता. घर पहुँचाने से पहले रास्ते में सोचता जाता कि मालिक को अच्छे मूड में देखकर अपने छोटे भाई को होटल में काम पर रखने के लिए विनती करूँगा.

---- अनुग्रह नारायण ओझा, बिहार


शनिवार, दिसंबर 24

73 करोड़ का हवाई जहाज

तीनो बच्चे भूख से बेचैन होकर रोते-रोते सो गए थे. उनकी माँ माथा पकडे बैठी थी. तभी उनका बाप झोपड़ें में दाखिल हुआ.
पति को आया देखकर वह बोली ,"निखट्टू, आज फिर खाली हाथ आ गया" और उसने खाली पतीली घुस्से से उसकी तरफ उछाल दी.
यह उसी समय की बात है जब मुखेश अंबानी ने अपनी पत्नी को 73  करोड़ का हवाई जहाज तोहफे में दिया था......

लेखक - अशोक भाटिया, हरियाणा